ठाकरे परिवार के मिलन के बाद BMC चुनाव में अजित पवार ला सकते हैं नया राजनीतिक ट्विस्ट, जानिए कैसे?

ठाकरे परिवार के मिलन के बाद BMC चुनाव में अजित पवार ला सकते हैं नया राजनीतिक ट्विस्ट, जानिए कैसे?

मुंबई की राजनीति फिर से गरमा गई है। ठाकरे परिवार के मिलन के बाद अब बीएमसी चुनाव में अजित पवार एक नया मोड़ ला सकते हैं। सवाल यह है कि यह ट्विस्ट किसके लिए खतरा बनेगा और किसके लिए मौका?

ठाकरे परिवार के मिलन से मुंबई की सियासत कैसे बदल गई?

बीएमसी चुनाव से पहले सबसे बड़ा बदलाव यही है कि उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक साथ आ गए हैं। दो दशक से चल रही खींचतान खत्म हुई और दोनों ने गठबंधन की घोषणा कर दी।

मुंबई में बीएमसी सिर्फ एक नगर निकाय नहीं, पूरे देश की सबसे अमीर नगरपालिका है। यहां की कुर्सी मतलब, पूरे महाराष्ट्र की सत्ता के लिए माहौल बदलना। इसलिए ठाकरे परिवार का ये मिलन विपक्ष के लिए ऊर्जा है, तो सत्ता पक्ष के लिए चुनौती भी।

महायुति के भीतर खींचतान: अजित पवार कहां फिट होते हैं?

अजित पवार की एनसीपी (एपी) अभी महायुति गठबंधन का हिस्सा है। पर बीएमसी चुनाव के मामले में तस्वीर साफ नहीं दिख रही। कारण सिर्फ सीट बंटवारा नहीं। असली विवाद है चेहरे और संदेश का।

पार्टी सूत्रों के अनुसार अजित पवार और वरिष्ठ नेता सुनील तटकरे मुंबई के अनुशक्तिनगर क्षेत्र में कार्यकर्ताओं की बड़ी मीटिंग करने जा रहे हैं। यहीं से संकेत मिल रहा है कि एनसीपी (एपी) बीएमसी चुनाव के लिए अलग कैंपेन शुरू कर सकती है। मतलब, गठबंधन में रहकर भी मैदान में अकेले उतरने जैसी स्थिति बन सकती है।

नवाब मलिक पर विवाद: एक नेता से पूरा चुनाव कैसे प्रभावित हो रहा है?

बीएमसी चुनाव में नवाब मलिक का नाम केंद्र में आ गया है। उन्हें मुंबई में एनसीपी का चुनाव प्रभारी बनाया गया। यहीं से विवाद शुरू हुआ।

बीजेपी और महायुति के कई नेताओं ने इस नियुक्ति पर आपत्ति जताई। उन पर पहले लगे आरोपों का फिर से हवाला दिया गया। मलिक को 2022 में मनी लॉन्ड्रिंग केस में गिरफ्तार किया गया था और उन पर अंडरवर्ल्ड से जुड़े प्रॉपर्टी डील्स के आरोप लगे थे। अभी वह स्वास्थ्य कारणों से जमानत पर हैं।

बीजेपी की दिक्कत सिर्फ कानूनी केस नहीं। उन्हें डर है कि ऐसे चेहरे के साथ खुलकर खड़े होने पर उनका “क्लीन इमेज” और हिंदुत्व वोट बैंक प्रभावित हो सकता है। इसलिए मुंबई बीजेपी ने साफ संकेत दिया कि अगर मलिक ही एनसीपी के नेता रहेंगे तो गठबंधन में दूरी रहेगी।

एनसीपी झुकेगी या टकराएगी? सुनील तटकरे का सख्त संदेश

एनसीपी की ओर से सुनील तटकरे पहले ही कह चुके हैं कि पार्टी किसी “बाहरी दबाव” के आगे नहीं झुकेगी। यानी नवाब मलिक को हटाने की मांग पर वे बहुत नरम दिखना नहीं चाहते।

यही रुख महायुति की अंदरूनी राजनीति को और पेचीदा बना रहा है। बीजेपी के कुछ नेता साफ कह चुके हैं कि उन्हें मलिक के नेतृत्व में काम करने में “असुविधा” है। पर एनसीपी अपने पुराने संगठन में उनका प्रभाव भी नहीं खोना चाहती। यह टकराव ही आगे चलकर अलग कैंपेन की बुनियाद बन सकता है।

बीजेपी का चुनावी गणित: दूरी भी, फायदा भी

ऊपर से देखिए तो लगेगा कि बीजेपी और एनसीपी के बीच खटास बढ़ रही है। पर अगर चुनावी गणित की नजर से देखें तो तस्वीर थोड़ी अलग है।

2017 के पिछले बीएमसी चुनाव में एनसीपी के 9 में से 7 कॉर्पोरेटर मुंबई के पूर्वी उपनगरों से चुने गए थे। ये इलाके मुस्लिम और दलित वोटरों से भरे हैं, जहां नवाब मलिक की पकड़ मानी जाती है। अब अगर यही एनसीपी खुले तौर पर बीजेपी के साथ दिखती है, तो इस वोट बैंक के खिसकने का खतरा है।

बीजेपी के लिए बेहतर रणनीति यह हो सकती है कि एनसीपी आधिकारिक रूप से अलग दिखे, पर चुनाव बाद उसके नंबर साथ जोड़ लिए जाएं। अगर एनसीपी अच्छा प्रदर्शन करती है तो बाद में समर्थन ले लिया जाएगा। अगर कमजोर रहती है तो भी उसका एक रोल रहेगा—अल्पसंख्यक वोटों को बांटना और कांग्रेस व उद्धव ठाकरे गुट को नुकसान पहुंचाना।

अजित पवार का स्वतंत्र कैंपेन: बीएमसी में नया ट्विस्ट कहां से आएगा?

अब असली बात पर आइए। अजित पवार अगर स्वतंत्र कैंपेन शुरू करते हैं तो इसका असर किस तरह होगा?

  • महायुति की एकता पर सवाल खड़े होंगे।
  • एनसीपी (एपी) अपने लिए अलग पहचान बनाने की कोशिश करेगी।
  • अल्पसंख्यक और गैर-परंपरागत वोटरों में भ्रम की स्थिति बनेगी।

मुंबई जैसे शहर में, जहां वार्ड–वार्ड पर जाति, समुदाय, इलाका और चेहरों की राजनीति चलती है, वहां एक अलग कैंपेन बहुत वोट सीधे नहीं तोड़ेगा, पर समीकरण ज़रूर बदल देगा। खासकर उन सीटों पर, जहां मुकाबला कड़ा है और हार–जीत का फर्क कुछ सौ वोटों तक ही रहता है।

क्या यह “घर वापसी” की तैयारी भी हो सकती है?

महाराष्ट्र की राजनीति में एक और कहानी चल रही है—अजित पवार की संभव घर वापसी। 2023 में उन्होंने अपने चाचा शरद पवार से अलग होकर बीजेपी के साथ गठबंधन किया था। इस फैसले ने पूरे राज्य की राजनीति हिला दी थी।

अब अंदरखाने ऐसी चर्चाएं हैं कि कुछ स्तर पर फिर से बातचीत हो रही है। एनसीपी (शरद पवार गुट) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले भी इशारों में यही बात रख चुकी हैं कि पुणे नगर निगम चुनाव के लिए कोई स्थानीय गठजोड़ संभव हो सकता है, बशर्ते शरद पवार समर्थकों का भरोसा वापस जीता जाए।

अगर बीएमसी में अजित पवार खुद को “स्वतंत्र ताकत” के रूप में पेश करते हैं, तो आगे चलकर यह लचीलापन उनके लिए दोनों तरफ के दरवाजे थोड़ा खुले रख सकता है। न पूरी तरह बीजेपी पर निर्भर, न पूरी तरह वापसी से इंकार। यही राजनीतिक लचीलापन आगे बड़ा ट्विस्ट बन सकता है।

ठाकरे गठबंधन बनाम महायुति बनाम एनसीपी: कौन किसका वोट काटेगा?

मुंबई में अब मैदान तीन हिस्सों में बंटता दिख रहा है:

  • ठाकरे परिवार गठबंधन – भावनात्मक और मराठी अस्मिता का कार्ड, पुराने शिवसैनिकों की निष्ठा के साथ।
  • महायुति (बीजेपी–शिंदे गुट–अन्य) – मजबूत चुनाव मशीनरी, संसाधन और सत्ता की ताकत के साथ।
  • एनसीपी (अजित पवार) – सीमित पर प्रभावी pockets, खासकर पूर्वी उपनगरों में अल्पसंख्यक और दलित इलाकों में।

अगर एनसीपी स्वतंत्र रूप से लड़ती है तो:

  • कुछ वार्डों में कांग्रेस और उद्धव ठाकरे गुट के वोट सीधे कट सकते हैं।
  • कुछ जगहों पर बीजेपी के लिए “बैकडोर मदद” का काम होगा।
  • और जहां मुकाबला बेहद करीबी होगा, वहां एक–दो कॉर्पोरेटर भी सत्ता संतुलन बदल सकते हैं।

आपके लिए इसका मतलब क्या है, एक आम मुंबईकर के रूप में?

आप सोच रहे होंगे, यह सब जोड़–घटाव नेताओं के लिए है, मेरा इससे क्या लेना? पर बीएमसी के फैसले ही आपके रोजमर्रा के जीवन पर असर डालते हैं। सड़क की मरम्मत, नालों की सफाई, बारिश में पानी भरना या न भरना, स्कूल–अस्पतालों की हालत—सब कुछ।

जब राजनीतिक गठबंधन कमजोर या उलझे हुए होते हैं तो जवाबदेही अक्सर धुंधली हो जाती है। हर कोई दूसरे पर ठीकरा फोड़ देता है। दूसरी तरफ, जब एक मजबूत विपक्ष और मजबूर सत्तापक्ष होता है तो आमतौर पर काम थोड़ा बेहतर और डर के साथ होता है।

इसीलिए अजित पवार का संभावित स्वतंत्र कैंपेन, ठाकरे परिवार का मिलन और महायुति की अंदरूनी खींचतान—ये सब सिर्फ राजनीतिक कहानी नहीं हैं। ये तय करेंगे कि अगले पांच साल में मुंबई कितनी साफ, कितनी सुरक्षित और कितनी व्यवस्थित दिखेगी।

नया ट्विस्ट आगे कैसे बढ़ सकता है?

आने वाले दिनों में कुछ बातें इस ट्विस्ट की दिशा तय करेंगी:

  • क्या एनसीपी आधिकारिक तौर पर अकेले कैंपेन का ऐलान करेगी?
  • क्या बीजेपी सच में नवाब मलिक के मुद्दे पर एनसीपी से दूरी बनाए रखेगी, या यह सिर्फ दबाव की रणनीति है?
  • क्या ठाकरे गठबंधन अपने जोश को जमीनी बूथ प्रबंधन में बदल पाएगा?

मुंबई की राजनीति हमेशा अचानक मोड़ लेती है। ठाकरे परिवार का मिलन एक बड़ा भावनात्मक मोमेंट है। अब देखना यह है कि अजित पवार इस माहौल में अपने लिए जगह कैसे बनाते हैं। आप चाहे किसी भी पक्ष को पसंद करते हों, इतना तो तय है कि इस बार बीएमसी चुनाव सिर्फ स्थानीय नहीं, पूरे महाराष्ट्र की दिशा तय करने वाला मुकाबला बनने जा रहा है।

5/5 - (17 votes)

Auteur/autrice

  • एस्टेबान लौरियर एक पत्रकार र भोजन समीक्षक हुन् जो आफ्नो अतृप्त जिज्ञासा र कडा सम्पादकीय दृष्टिकोणका लागि प्रख्यात छन्। द्विभाषी, उनले युरोप र एसियाका धेरै विशेष मिडिया माध्यमहरूमा योगदान पुर्‍याएका छन्, र युवा शेफहरूका लागि पाकशाला कार्यशालाहरूको नेतृत्व गरेका छन्। भोजन संस्कृतिहरू साझा गर्न उत्साहित, उनी पाककला क्षेत्रका प्रवृत्तिहरू, नवीनताहरू र चुनौतीहरूको विश्लेषण गर्छन् र पाककला अभ्यासहरूको विकासबारे गहिरो अनुसन्धान गर्छन्। उनको लेखनले पाठकहरूलाई समकालीन पाककलाको खोजीमा साथ दिनका लागि कठोरता, खुलापन र शिक्षणकलालाई संयोजन गर्दछ।

Partagez votre amour

Laisser un commentaire

Votre adresse e-mail ne sera pas publiée. Les champs obligatoires sont indiqués avec *