कोलकाता के पास एक स्कूल फंक्शन में माता के भजन पर इतना बड़ा बवाल होगा, शायद किसी ने सोचा भी नहीं था। एक तरफ स्टेज पर भक्ति-गीत, दूसरी तरफ भीड़ के बीच से आती गालियां, धक्का-मुक्की और फिर पुलिस केस। यह घटना सिर्फ एक सिंगर या एक आयोजक की नहीं, यह उस सवाल की भी कहानी है कि क्या किसी को यह हक है कि वह आपको बताए कि आप कौन सा गाना गा सकते हैं और कौन नहीं?
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क्या हुआ था ईस्ट मिदनापुर के इस स्कूल फंक्शन में?
ईस्ट मिदनापुर के भगवानपुर इलाके के एक प्राइवेट स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था। मंच पर जानी-मानी बंगाली सिंगर लगनाजिता चक्रवर्ती लाइव परफॉर्म कर रही थीं। उनका लोकप्रिय गाना “बसंतो एशे गेछे” तो आप ने भी शायद कभी सुना होगा।
कार्यक्रम के बीच वह एक धार्मिक भजन “जागो मां” गा रही थीं। बताया गया कि इसी दौरान मुख्य आयोजक और स्कूल मालिक महबूब मलिक स्टेज की ओर बढ़े। यहीं से तनाव शुरू हो गया।
‘बहुत हो गया जागो मां’ – विवाद की जड़
लगनाजिता की शिकायत के अनुसार, मलिक ने स्टेज पर आकर उन पर चिल्लाना शुरू कर दिया। उनका आरोप है कि आयोजक ने कहा, “बहुत हो गया जागो मां, अब कुछ सेक्युलर गाना गाइए” और उन पर गाली-गलौज की। सिंगर का कहना है कि सिर्फ शब्दों से नहीं, शारीरिक रूप से भी उन पर हमला करने की कोशिश की गई।
यहीं वह पल था जब माहौल पूरी तरह बदल गया। एक तरफ भजन चल रहा था, दूसरी तरफ “ई ना चोलबे” (यह नहीं चलेगा) जैसे शब्द सुनाई पड़ रहे थे। सोचिए, आप स्टेज पर हों, सामने सैकड़ों लोग हों और अचानक आप पर कोई चढ़ आए। यह सिर्फ पेशेवर अपमान नहीं, सुरक्षा का डर भी होता है।
पुलिस की भूमिका: पहले इनकार, फिर गिरफ्तारी
लगनाजिता के अनुसार, वह सीधे भगवानपुर पुलिस स्टेशन पहुंचीं और शिकायत दर्ज करवाने की कोशिश की। उनका आरोप है कि स्टेशन इंचार्ज ने पहले केस दर्ज करने से इनकार कर दिया। इस इनकार ने पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया।
बाद में मामला ऊपर तक गया। सीनियर अधिकारी मिथुन डे ने बताया कि आखिरकार एफआईआर दर्ज हुई और महबूब मलिक को गिरफ्तार कर लिया गया। साथ ही, जिस थाने ने शुरुआत में शिकायत लेने से मना किया था, उसके इंचार्ज और एक अन्य अधिकारी के खिलाफ डिपार्टमेंटल जांच भी शुरू कर दी गई। यह कदम महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे संदेश जाता है कि पुलिस की लापरवाही भी जांच के दायरे में है।
आरोपी पक्ष की दलील: ‘धार्मिक गाना नहीं, पैसों का झगड़ा’
दूसरी तरफ, महबूब मलिक के भाई मसूद मलिक की कहानी बिल्कुल अलग है। उनका कहना है कि मामला गाने का कम और पैसों का ज्यादा था। उनका आरोप है कि लगनाजिता ने अतिरिक्त भुगतान की मांग की, क्योंकि उन्हें स्टेज पर आने में देरी हुई थी।
परिवार का दावा है कि वह अपनी आने वाली फिल्म का एक धार्मिक गाना गा रही थीं। स्कूल फंक्शन होने के कारण उनसे “सेक्युलर गाना” गाने का अनुरोध किया गया। उनके अनुसार, इस बात से नाराज होकर सिंगर ने परफॉर्मेंस रोक दी और सीधा थाने चली गईं। साथ ही, वे कहते हैं कि जो शिकायत दर्ज हुई है, वह इसलिए है क्योंकि उन्होंने एक्स्ट्रा पैसे देने से इनकार कर दिया।
सिंगर की प्रतिक्रिया: ‘मुझे पुलिस पर भरोसा है’
लगनाजिता ने इन सभी आर्थिक विवाद वाले आरोपों को सिरे से नकार दिया। उनका कहना है कि मामला स्पष्ट रूप से दुर्व्यवहार और धमकी का है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्हें पुलिस और कानून पर भरोसा है और वह चाहती हैं कि मामले की जांच निष्पक्ष और गंभीरता से हो।
एक कलाकार के लिए स्टेज उसकी कार्यस्थली होती है। अगर वहीं वह सुरक्षित महसूस न करे, तो आगे आने वाले युवा कलाकारों को क्या संदेश जाएगा? यह सवाल भी अब लोगों के मन में उठ रहा है।
राजनीतिक तूफान: ‘हिंदू विरोधी रवैया’ बनाम ‘सच्चाई की जांच’
मामला यहीं नहीं रुका। जैसे ही गिरफ्तारी और विवाद की खबर बाहर आई, यह मुद्दा राजनीतिक रंग भी लेने लगा। भारतीय जनता पार्टी के नेता शंकुदेब पांडा ने आरोप लगाया कि महबूब मलिक सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस से जुड़े हुए हैं।
उनका कहना था कि पश्चिम बंगाल में “जिहादियों के हाथ में सबकुछ है” और यह कि एक सिंगर को यह बताया जा रहा है कि वह कौन सा गाना गाए, यह हिंदू विरोधी रवैया है। साथ ही उन्होंने पुलिस पर भी आरोप लगाया कि शुरुआती दौर में शिकायत दर्ज न करना, “ममता बनर्जी की पुलिस” का पक्षपाती रवैया दिखाता है। तृणमूल कांग्रेस की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
धार्मिक गाना, सेक्युलर गाना: असली सवाल क्या है?
थोड़ा रुककर सोचिए। क्या किसी स्कूल फंक्शन में भजन गाना गलत है? या किसी आयोजक को यह अधिकार है कि वह सिंगर से कहे, “अब बस, कुछ और गाइए”? तकनीकी रूप से, कार्यक्रम का कॉन्सेप्ट, दर्शक और माहौल तय करना आयोजकों का हक होता है। लेकिन क्या उस हक के नाम पर गाली, धमकी या हिंसा को सही ठहराया जा सकता है?
भारत जैसे देश में, जहां हर दिन कहीं न कहीं कीर्तन, कव्वाली, भजन, सूफी गाने और फिल्मी गाने साथ-साथ चलते हैं, वहां “ई ना चोलबे” वाला रवैया बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है। विवाद की जड़ चाहे जो हो, स्वर तो एक ही निकल रहा है – असहिष्णुता और असम्मान।
आप के लिए सीख: स्टेज, सम्मान और कानून
अगर आप भी किसी कार्यक्रम, स्कूल फंक्शन या धार्मिक आयोजन के साथ जुड़े हैं, तो यह घटना एक तरह से चेतावनी भी है। कुछ बातें हमेशा याद रखनी चाहिए:
- किसी भी कार्यक्रम में गाने या कंटेंट को लेकर पहले ही स्पष्ट सहमति बना लेना बेहतर होता है।
- कलाकार हो या आयोजक, किसी को भी गाली, धमकी या शारीरिक हिंसा का अधिकार नहीं।
- अगर आपके साथ बदसलूकी हो, तो शांत रहें, वहां से अलग हो जाएं और तुरंत कानूनी मदद लें।
- पुलिस शिकायत दर्ज न करे, तो उच्च अधिकारियों, महिला आयोग या मानवाधिकार संस्थाओं से भी संपर्क किया जा सकता है।
इस मामले में यह सकारात्मक बात है कि अंततः एफआईआर दर्ज हुई, गिरफ्तारी हुई और पुलिस अधिकारियों पर भी जांच शुरू हुई। यह दिखाता है कि दबाव और आवाज, दोनों मिलकर व्यवस्था को जवाबदेह बना सकते हैं।
आगे क्या: न्याय, नहीं तो और अविश्वास
अब पूरा मामला जांच के अधीन है। यह तय करना अदालत और जांच एजेंसियों का काम है कि किसकी बात सच के ज्यादा करीब है। क्या यह सचमुच धार्मिक गीत की वजह से भड़का विवाद था या पैसों और अहंकार की लड़ाई?
लेकिन एक बात साफ है। अगर इस तरह के मामलों में पारदर्शी और समय पर न्याय नहीं होगा, तो समाज में अविश्वास और गुस्सा ही बढ़ेगा। और अगर सच सामने आता है, तो यह केस एक मिसाल बन सकता है कि स्टेज पर, चाहे भजन हो या सेक्युलर गाना, कलाकार का सम्मान और सुरक्षा किसी भी बहस से ऊपर है।
शायद यही सबसे बड़ा सवाल है जो यह घटना आपके और हमारे सामने छोड़ जाती है – क्या हम अपने आसपास ऐसी हवा बना रहे हैं, जहां कोई निडर होकर गा, बोल और जी सके?




